कामरु देश कंहा है और कामरु देश का जादू कैसे सीखे | कामरु देश का जादू

Kamaru desh ka jadu tona ? असम प्रदेश में स्थित जिला गुवाहाटी कमरू देश तंत्र मंत्र के लिए एक प्रमुख स्थान है जहां पर काले जादू प्रमुख केंद्र माना जाता है तंत्र मंत्र की साधना करने वाले लोगों के लिए यह देश एक स्वर्ग के समान है जहां पर मां काली की पूजा विशेष रूप से की जाती है।

कामरु देश के बारे में कामरु देश की जानकारी बताइए कामरु देश की विधि samudra ka rahasya kamru desh ka vidhi kamru desh kaha hai

कमरू देश प्रमुख रूप से माता कामाख्या के लिए प्रसिद्ध है जहां पर माता कामाख्या की योनि की पूजा की जाती है लेकिन यहां की अधिष्ठाता माता कामाख्या है। कमरू देश कि सीमा संपूर्ण ब्रह्मपुत्र घाटी से लेकर पश्चिम में बिहार तक दक्षिणी उड़ीसा तक नृत्य में पश्चिम बंगाल एवं बंगाल तक फैली हुई थी कमरुदेश का संपूर्ण क्षेत्रफल लगभग 1700 किलोमीटर तक है।

कमरू देश का इतिहास क्या है ?

600 ईसवी संवत से लेकर 6:30 सौ ईसवी संवत तक कुमार भास्कर वर्मन इस देश के अंतिम राजा रहे जो आजीवन आविवाहित रहे इनकी राजधानी प्रागज्योतिषपुर रही। 15 वीं सदी में अलाउद्दीन हुसैन शाह नाम की विदेशी लुटेरे ने इस देश को मिटाने का प्रयास किया और लूटपाट दिया।

अलाउद्दीन हुसैन शाह के अत्याचार के बावजूद भी असम का कमरुदेश 350 ईसवी संवत से लेकर 1140 ईसवी संवत तक अस्तित्व में रहा जो लगभग 800 साल के आसपास अस्तित्व को दर्शाता है। राजा कुमार भास्कर वर्मन एक सनातन धर्म को मानने वाले थे परंतु के अन्य धर्म बौद्ध एवं जैन धर्म के लोगों का भी सम्मान करते थे।

कमरुदेश आज असम का एक जिला है जहां पर कामाख्या देवी मंदिर तंत्र-मंत्र के लिए दुनिया में प्रसिद्ध है यहां पर आज भी हजारों तंत्र मंत्र की साधना करने वाले तांत्रिक आते रहते हैं और अपनी तंत्र साधनाएं संपूर्ण करते हैं।

कमरुदेश का कामाख्या मंदिर नीलगिरी पहाड़ियों की सीमाओं में स्थित है जहां पर हजारों प्रकार के तांत्रिक अपनी साधना के लिए प्रसिद्ध है यहां पर यह तांत्रिक विभिन्न प्रकार की समस्याओं के समाधान का दावा भी करते हैं जिनका माध्यम तंत्र मंत्र होता है। अघोर साधना का कमरू देश आज विश्व में प्रसिद्ध है।


कमरू देश के लोग और रहन सहन

गुवाहाटी का पुराना नाम प्रगज्योतिषपुर था यहां पर प्रमुख रूप से बोडो समुदाय के लोग रहते हैं यहां की भाषा असमिया या आसामी बोली जाती है। यहां के लोग बांस के बने खंभों पर अपना घर बनाते हैं क्योंकि यहां पर बारिश अधिकांश मात्रा में होने के कारण बाढ़ अधिक आती है जिसकी वजह से घरों को यह बांस पर बनाते हैं।

खानपान की बात की जाए तो यहां के लोग हार नाम सुप्रसिद्ध व्यंजन को अधिक पसंद करते हैं जो कच्चा पपीता डालें और मांस से मिलकर बना होता है यहां पर लोग मांसाहारी अधिक मिलते हैं इनका प्रमुख भोजन मांस के साथ ही होता है। खार व्यंजन एक प्रकार की करी है।

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  1. आलू पिटिका
  2. जाक अरु भाजी
  3. बाणगजिजोर
  4. लागोट कुकुरा
  5. पारो मंदोहो

जैसे व्यंजन यहां के प्रसिद्ध व्यंजन है जो कबूतर के मांस से बना होता है और यहां का प्रसिद्ध पारिवारिक व्यंजन रेशम के कीड़ों से बनाया जाता है तथा पीठा नाम की मिठाई यहां की प्रसिद्ध मिठाई है। यहां के लोग अधिकांश मांसाहारी होने के कारण पर्यटन करने वाले लोगों को अपने भोजन की व्यवस्था स्वयं करनी पड़ती है अर्थात यदि आप शाकाहारी तो जब भी आप यहां आए तो भोजन की व्यवस्था अपनी तरफ से करके आएं।

कमरुदेश का कामाख्या मंदिर

( यह लेख आप OSir.in वेबसाइट पर पढ़ रहे है अधिक जानकारी के लिए OSir.in पर जाये  )

असम में स्थित कमरुदेश का कामाख्या मंदिर तंत्र मंत्र अघोरी साधना ओं का प्रसिद्ध स्थान है जहां पर माता कामाख्या की योनि की पूजा की जाती है कहा जाता है कि जब माता सती को लेकर भगवान शंकर तांडव करने लगे तब भगवान विष्णु ने माता सती के अपने सुदर्शन चक्र से 51 टुकड़े कर दिए थे और माता सती के 51 टुकड़े जहां जहां पर गिरे वहां पर उनके शक्तिपीठों को स्थापित किया गया।

जब भगवान शंकर मां सती को लेकर जा रहे थे तो उनकी योनि कमरू देश मैं गिरी थी जिसके कारण यहां पर कामाख्या मंदिर के रूप में माता सती की रजस्वला योनि की पूजा की जाती है ऐसा भी मान्यता है कि हर महीने माता की योनि रजस्वला होती है।

मान्यता है कि जब माता रजस्वला होती है तो 3 दिन के लिए मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं और 3 दिन बाद मंदिर में रजस्वला के कारण लाल हो जाता है तथा ब्रह्मपुत्र नदी का पानी भी इस दौरान लाल हो जाता है। कुछ लोग मानते हैं कि ब्रह्मपुत्र नदी का पानी लाल होने के कारण वहां पर दी जाने वाली जानवरों की बलि के कारण होता है या फिर मंदिर पर चढ़ाए गए सिंदूर के कारण होता है।

यह मंदिर सतयुग से लेकर आज तक चला आ रहा है हालांकि इस मंदिर पर कई बार विदेशी आक्रांता ओं ने नष्ट करने के लिए आक्रमण किया लेकिन इसके अस्तित्व को नहीं मिटा पाए क्योंकि मान्यता है कि माता के अस्तित्व के कारण आक्रांता नष्ट हो गए यह भी मान्यता है कि इस मंदिर का जीर्णोद्धार नर नारायण ने किया था।

कामाख्या मंदिर का दर्शन का समय

वैसे तो कामाख्या मंदिर के दर्शन का समय प्रातः 8:00 बजे से लेकर दोपहर के 1 बजे तक होता है और फिर 2:30 बजे से लेकर 5:30 बजे तक दर्शन हेतु कपाट खोले जाते हैं यहां पर लोग दर्शन के लिए सुबह से ही लाइन में खड़े हो जाते हैं और शाम 5:00 बजे तक दर्शन करते रहते हैं। यदि जो लोग लाइन में नहीं खड़े होना चाहते हैं उनके लिए टिकट की व्यवस्था है जहां पर ₹500 का टिकट लेकर सीधे कामाख्या मंदिर के दर्शन किए जा सकते हैं।

कामाख्या मंदिर तक कैसे पहुंचे ?

अगर आप आसाम की यात्रा पर हैं और कामाख्या मंदिर के दर्शन करना चाहते हैं तो इसके लिए एयरपोर्ट के माध्यम से पहुंचा जा सकता है असम में गुवाहाटी में स्थित गोपीनाथ बरदलोई एयरपोर्ट सबसे प्रसिद्ध एयरपोर्ट है जहां से कामाख्या मंदिर की दूरी 20 किलोमीटर है। अगर कोई यात्री रेल यात्रा करके असम की यात्रा कर रहा है और वह कामाख्या मंदिर के दर्शन करना चाहते हैं

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तो नार्थ वेस्ट रेलवे स्टेशन के माध्यम से कामाख्या मंदिर पहुंच सकते हैं जहां से लगभग 7 किलोमीटर दूरी पर कामाख्या मंदिर है। यदि आप बस यात्रा कर रहे हैं तो यहां पर सभी प्रदेशों से आने वाली बस स्टेशन पर पहुंच कर कामाख्या के दर्शन कर सकते हैं स्टेट बस स्टॉप आप टैक्सी के माध्यम से कामाख्या तक पहुंच सकते हैं असम की सबसे प्रसिद्ध चाय हिचकियां यहां पर बड़े ही प्यार से ले जा सकती हैं।

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