(सम्पूर्ण कथा) खाटू श्याम की कथा और खाटू श्याम नाम क्यों पड़ा ? | Khatu shyam ki katha

खाटू श्याम की कथा Khatu shyam ki katha : हेलो मित्रों नमस्कार आज मैं आप लोगों को इस लेख के माध्यम से खाटू श्याम की कथा से संबंधित जानकारी प्रदान करूंगी जिसमें मैं आप लोगों को सबसे पहले बताऊंगी खाटू श्याम कौन है और इनका नाम खाटू श्याम क्यों पड़ा ? उसके पश्चात बताऊंगी खाटू श्याम की संपूर्ण कथा क्या है ?

खाटू श्याम की कथा Khatu shyam ki katha

क्योंकि खाटू श्याम को लेकर ऐसी मान्यता है कि राजस्थान के सीकर जिले में इनका एक बहुत ही विशाल और भव्य मंदिर निर्मित है जहां पर हर साल लाखों करोड़ों संख्या में इनके भक्त इनके दर्शन के लिए आते हैं और खाटू श्याम बाबा हर किसी की मनोकामना पूर्ति करते हैं.

खाटू श्याम बाबा को लेकर यह भी कहा जाता है अगर कोई भी व्यक्ति अच्छे कर्म करता है तो खाटू श्याम बाबा उस व्यक्ति को रंक से राजा बना सकते हैं और अगर कोई व्यक्ति अपने जीवन का दुरुपयोग करता है तो उस व्यक्ति के जीवन में खाटू श्याम बाबा अशुभ फल देते हैं क्योंकि खाटू श्याम को कलयुग अवतारी श्री कृष्ण के रूप में पूजा जाता है, खाटू श्याम बाबा को श्री कृष्ण के रूप में क्यों पूजा जाता है इसके पीछे एक पौराणिक कथा बताई गई है.

और उसी पौराणिक कथा के विषय में संपूर्ण जानकारी आज मैं आप लोगों को इस लेख के माध्यम से बताऊंगी ऐसे में अगर आप लोग भी श्री कृष्ण के कलयुग अवतारी खाटू श्याम बाबा को मानते हैं और इनके विषय में अधिक से अधिक जानकारी को प्राप्त करना चाहते हैं तो इस लेख को शुरू से अंत तक अवश्य पढ़ें.

खाटू श्याम कौन है और इनका नाम खाटूश्याम क्यों पड़ा ?

खाटू श्याम पांडुपुत्र भीम के पुत्र है. इनके खाटू श्याम नाम को लेकर ऐसी मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण खाटू श्याम की अपार शक्ति और सहनशीलता क्षमता से प्रभावित होकर इन्हें कलयुग में अपने अवतार में पूजे जाने का वरदान प्रदान किया था.

khatu shyam


जिसमें श्री कृष्ण ने कहा था, कलयुग में जो भी भक्त तुम्हारे दर्शन करेगा तो समझो कि वह हमारे दर्शन करेगा और जो भी भक्त तुम्हारे नाम का जाप करेगा समझो उसने मेरे नाम का जाप कर लिया यानी कि श्रीकृष्ण ने इन्हें अपने बराबर का दर्जा दिया था जिसकी वजह से इनका नाम खाटूश्याम पड़ गया.

खाटू श्याम की कथा | Khatu shyam ki katha

पौराणिक कथाओं के अनुसार खाटू श्याम की कथा को लेकर ऐसा बताया गया है पांडव वनवास के समय अपनी जान बचाते हुए भाग रहे थे तभी भीम का सामना हिडिंबा नाम की एक स्त्री रूपी राक्षसी से हुआ और जब हिडिंबा ने भीम को देखा तो वह भीम को अपने पति के रूप में स्वीकार करना चाहती थी. जिसके लिए उसने भीम को अपने प्रेम जाल में फंसाया उसके पश्चात भीम ने माता कुंती की आज्ञा पाकर हिडिंबा से विवाह रचा लिया.

विवाह के कुछ समय पश्चात हिडिंबा की कोख से घटोत्कच का जन्म हुआ , जो बहुत ही अपार शक्तिशाली बालक था, और जब हिडिंबा का यही पुत्र बड़ा हुआ तो भीम और हिडिंबा ने मिलकर अपने बेटे का विवाह रचा दिया बेटे के विवाह के पश्चात घटोत्कच की पत्नी मौरवी ने बर्बरीक नाम के पुत्र को जन्म दिया, जो अपने पिता यानी कि घटोत्कच से भी अधिक ताकतवर, मायाबी और शक्तिशाली था.

क्योंकि बर्बरीक देवी मां और बोलेनाथ का भक्त था और देवी मां की सच्ची भक्ति के दौरान बर्बरीक को देवी मां और बोलेनाथ के वरदान से तीन दिव्य बाण प्राप्त हुए थे जो अपने लक्ष्य को भेद कर वापस लौट आते थे, और इन्हीं तीन दिव्य बाण की वजह से बर्बरीक हमेशा के लिए अजर अमर हो गया. एक समय आया जब कौरव और पांडव के बीच युद्ध का सामना होना था, तो बर्बरीक के मन में युद्ध को देखने का विचार आया. उसी दौरान बर्बरीक युद्ध देखने के लिए कुरुक्षेत्र की ओर प्रस्थान किया.

श्री कृष्ण के मन में यह था अगर बर्बरीक युद्ध में शामिल हुआ तो हार पाण्डवों लोगों की होगी और श्री कृष्ण नही चाहते थे की पाण्डवों को हार का सामना करना पड़े इसलिए श्री कृष्ण ने बर्बरीक को रोकना चाहा जिसके लिए श्री कृष्ण गरीब ब्राह्मण का वेश धारण किया और रास्ते में आ रहे बर्बरीक के समक्ष पहुंच गए और जब श्री कृष्ण बर्बरीक के समक्ष पहुंचे तो उन्होंने अनजान बनते हुए बर्बरीक से प्रश्न किया आप कौन हैं और आप कुरुक्षेत्र की ओर क्यों प्रस्थान कर रहे हैं.

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तब बर्बरीक ने जवाब दिया मैं एक महान शक्तिशाली योद्धा हूं और मैं अपने एक बाण से ही महाभारत युद्ध का निर्णय कर सकता हूं. तब श्री कृष्ण ने अनजान बनते हुए फिर से बर्बरीक से कहा अगर ऐसा है तो आप मुझे इस बात को हकीकत में बदल कर दिखाइए, तो बर्बरीक ने परंतु कैसे, तो श्री कृष्ण ने बर्बरीक से कहा ये हमारे सामने जो पीपल का वृक्ष है. इस पर जितनी भी पत्तियां है उनमें छेद करके दिखाईए.

श्री कृष्ण की इस बात को सुनकर बर्बरीक ने अपना एक तीर चलाया तो वहां पर एक पीपल का जो वृक्ष था उस वृक्ष के सारे पत्तों में छेद हो गया था, एक पता श्री कृष्ण के पैर के नीचे दबा हुआ था जिसकी वजह से बर्बरीक का चलाया हुआ बाण श्री कृष्ण के पैर के ऊपर ठहर गया.

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तब श्री कृष्ण ने बर्बरीक की क्षमता और शक्ति को देखकर हैरान थे वह किसी तरह से बर्बरीक को युद्धों में जाने से रोकना चाहते थे क्योंकि वह जानते थे अगर बर्बरीक युद्ध में गया तो हार पांडवों की होगी. इसीलिए श्री कृष्णा ने बड़े ही करुण शब्दों में बर्बरीक से कहां आप तो बहुत ही महान शक्तिशाली और परिक्रमा, व्यक्ति हैं,क्या मुझ गरीब को कुछ दान नहीं देंगे. श्रीकृष्ण को एक अनजान व्यक्ति समझते हुए बर्बरीक से श्री कृष्ण से कहा बोलो तुम्हें क्या चाहिए.

श्री कृष्ण ने बर्बरीक से तिरवाचा, (वचन) भरा लिया कि मैं जो भी मानूंगा. आप मना तो नहीं करेगे, इस बात को सुनकर बर्बरीक ने तिरवाचा भर दिया और कहा आप जो मांगोगे मैं देने के लिए तैयार हूं. तब श्री कृष्ण ने बर्बरीक से दान के रुप में बर्बरीक का शीष माग लिया.

जब श्री कृष्ण ने बर्बरीक से ऐसा दान मांगा तब बर्बरीक जान गया कि यह कोई सामान्य ब्राह्मण नहीं है. तब उसने श्री कृष्ण से कहा आप अपने असली रूप में आ जाइए और मुझे अपना परिचय दीजिए. मैं अपने वचन के मुताबिक आपको अपना शीश आवश्य दान करुंगा. तब श्रीकृष्ण ब्राह्मण के रूप से अपने असली रूप में प्रकट हुए और बर्बरीक को अपना संपूर्ण परिचय दिया. जब श्री कृष्ण ने बर्बरीक को अपना वास्तविक परिचय दिया तो बर्बरीक ने खुशी-खुशी अपना शीष श्री कृष्ण के चरणो में दान कर दिया.

लेकिन बर्बरीक ने श्री कृष्ण से युद्ध देखने की इच्छा प्रस्तुत की तब श्री कृष्ण ने बर्बरीक की इच्छा को स्वीकार करते हुए बर्बरीक का शीष युद्ध अवलोकन के लिए, एक ऊंचे स्थान पर स्थापित कर दिया. युद्ध संपन्न होने के पश्चात विजय पांडव की हुई. पांडवों की विजय होने के पश्चात सभी पांडव आपस में युद्ध जीतने का श्रेय प्राप्त करने के लिए लड़ रहे थे तभी श्री कृष्ण ने पांडवों से कहा युद्ध का श्रेय किसको मिला है इसका वर्णन बर्बरीक का शीष कर सकता हैं.

तब श्री कृष्ण ने बर्बरीक के शीश से निवेदन किया अपने युद्ध का सम्पुन चित्रण देखा है, इसलिए कृप्या करके यह बताने की चेष्टा करे कि इस युद्ध का श्रेय किसको मिलना चाहिए ? तब बर्बरीक के शीश ने पांडवों को बताया, युद्ध के दौरान श्री कृष्ण का चक्र चल रहा था जिसकी वजह से सभी योद्धा कटे हुए वृक्ष की तरह पराजित हो रहे थे और उधर द्रौपदी महाकाली के रूप में रक्तपान कर रही थी. बर्बरीक के इन शब्दों को सुनकर श्री कृष्ण बेहद ही प्रसन्न हुए और उन्होंने बर्बरीक को यह वरदान दिया कि आप कलयुग में हमारे रूप में पूजे जाएंगे और जो भी भक्त सच्चे दिल से आपके नाम का स्मरण करेगा तो उस भक्तों का कल्याण होगा और धर्म-अर्थ काम मोक्ष की प्राप्ति होगी.

स्वप्न दर्शनोंपरांत बर्बरीक खाटू श्याम बाबा के रूप में खाटू धाम में स्थित कुंड से प्रकट हुए थे. जब खाटू श्याम कुंड से प्रकट हुए, तो उसी स्थान पर सम्वत् 1777 में एक विशाल और भव्य मंदिर बनाकर तैयार कर दिया गया. जिसमें शालिग्राम की मूर्ति की स्थापना की गई थी यानी कि श्री कृष्ण के रूप में बर्बरीक की स्थापना की गई थी. जिन्हें खाटू श्याम के नाम से जाना जाता है और तभी से यहां पर हर वर्ष होली के दिन मेला लगता है और समस्त भक्त आकर खाटू श्याम की पूजा करके इनके दर्शन प्राप्त करते हैं तथा खाटू श्याम सच्चे दिल से भक्ति करने वाले समस्त भक्तों की मनोकामना को पूर्ण करते हैं.

FAQ : खाटू श्याम की कथा

खाटू श्याम का क्या चमत्कार है ?

खाटू श्याम बाबा के जो भी व्यक्ति को एक बार दर्शन करने आता है तो खाटू श्याम की महिमा इतनी अपरंपार है कि वह व्यक्ति इनका एक बार दर्शन करने के बाद बार-बार इनके दर्शन करने की मनोकामना रखता है.

खाटू श्याम का मंत्र बताएं

ॐ मोर्वी नन्दनाय विद् महे श्याम देवाय धीमहि तन्नो बर्बरीक प्रचोदयात्।

खाटू श्याम की महिमा बताइए ?

खाटू श्याम कलयुग में श्री कृष्ण के रूप में फोन से जाने वाले खाटू श्याम के नाम से जाने जाते हैं ऐसा माना जाता है जो भी वक्त खाटू श्याम के सच्चे दिल से दर्शन करने आता है तो खाटू श्याम अपने भक्तों की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं और उनके हर एक दुख को अपने आप में समाहित कर लेते हैं.

निष्कर्ष

तो मित्रों जैसा कि आज हमने इस लेख में आप सभी लोगों को खाटू श्याम कथा से संबंधित संपूर्ण जानकारी प्रदान करने की पूरी कोशिश की है जिसमें हमने आप लोगों को खाटू श्याम से संबंधित संपूर्ण कथा के विषय में सारी जानकारी बताई है अगर आप लोगों ने इस लेख को शुरू से अंत तक पढ़ा होगा तो आप लोगों को मालूम हो गया होगा खाटू श्याम कौन हैं और इनका खाटू श्याम नाम क्यों पड़ा तथा इनकी संपूर्ण कथा क्या है.

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